February 26, 2026, 11:48 am IST डी. पी. खरे in मंत्रियों के आय कर का भुगतान………जनता की जेब से | कल्चर
भक्त प्रह्लाद और होली का त्योहार
भक्त प्रह्लाद के पिता महाबलशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपु थे। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों भाई बहुत ही बलशाली दानव थे। ये दोनों महर्षि कश्यप और दिति के पुत्र थे। हिरण्याक्ष छोटा था तथा उसने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर पूरे संसार में आतंक मचा रखा था । महर्षि कश्यप की दूसरी पत्नी अदिति से इन्द्र और अन्य देवता उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार देवता और दानव वास्तव में सौतेले भाई थे परन्तु, हमेशा लड़ते रहते थे । जब भी देवताओं की हार होती थी तो वे भगवान विष्णु के पास चले जाते थे और विष्णु की मदद से पुनः जीत जाते थे । इसलिए दानव विष्णु को अपना कट्टर शत्रु मानते थे । हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने देवताओं को हराकर सभी लोकों पर विजय प्राप्त कर ली तो उसके बाद हिरण्याक्ष अपने शत्रु विष्णु की तलाश में निकल गया । जब उसे विष्णु कहीं नहीं मिले तो वह पृथ्वी को ले जाकर सागर में इस आशय से छिपा दिया कि पृथ्वी को बचाने तो विष्णु अवश्य आएंगे । तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी को सागर से लाकर अपनी कक्षा में रखा और हिरण्याक्ष को मारा । यहाँ प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब सागर पृथ्वी का ही हिस्सा है तो फिर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को सागर में कैसे छिपा दिया ? वास्तव में यह समझने का फेर है । पुराण में ऋषियों ने चौदह लोकों के बारे में लिखा है, जिनमें से एक रसातल भी है। विद्वानों ने इसी रसातल को भवसागर या खौगोलिय सागर या ब्रह्मांडीय महासागर (cosmic ocean) कहा है । हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को अपनी कक्षा से हटाकर वास्तव में इसी cosmic ocean में ही कहीं रख दिया था, जिसे भगवान विष्णु ने अपने वाराह अवतार के रूप में अपनी नियत कक्षा (orbit) में रख दिया ।
अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद तो हिरण्यकशिपु विष्णु को और भी कट्टर शत्रु समझने लगा। उसने ब्रह्मा जी से तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह देवता, दानव, पशु, यक्ष, मनुष्य के हाथों नहीं मारा जा सकता है, वह न तो दिन में मरे और न ही रात में, वह न तो घर में मरे और न ही बाहर, साथ ही किसी भी अस्त्र-शस्त्र से ही उसका वध न हो सके । अब तो उसने अजेय होकर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर लिया । उसके राज्य में कोई भी विष्णु या किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं कर सकता था । कहीं भी कोई भी हिरण्यकशिपु के अतिरिक्त किसी भी देवी-देवता की पूजा करता हुआ मिलता तो उसे यातना दी जाती थी ।
विष्णुपुराण की कथा के अनुसार दानवराज हिरण्यकशिपु का सबसे बड़ा पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे । अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकशपु ने प्रह्लाद को दानवों के गुरुकुल में भेज दिया और दो विशेष दानव-गुरु को भी इस निर्देश के साथ भेजा कि प्रह्लाद के दिमाग से विष्णु-भक्ति को निकाल दे। वहाँ भी प्रह्लाद अपने मित्रों को भी हरि-भक्ति ही सिखाया करता रहता था। तंग आकर हिरण्यकशपु ने प्रह्लाद को भरे दरबार में मृत्युदंड का आदेश दे दिया। यह देखकर दरबार में सब अचंभित हो गए कि बालक प्रह्लाद को कोई भी तलवार अथवा अस्त्र-शस्त्र छू भी नहीं सका। दैत्यराज हिरण्यकशपु ने और भी क्रोधित होकर प्रह्लाद को पागल हाथियों के सामने फेंकवा दिया, जिससे कि वह बालक हाथियों के पैरो तले कुचला जाए। परन्तु, हाथियों ने भी भक्त प्रह्लाद के समीप जाकर अपने सूंड को उठाकर वंदना ही की। इससे भी कुछ न होने पर हिरण्यकशपु ने बालक प्रह्लाद को जहरीले साँपों से भरे कुंए में फेकवा दिया। वहां भी असफल होने पर पहाड़ की ऊंची चोटी से नीचे गहरी खाई में फेंकवाया। फिर भी प्रह्लाद का कुछ नहीं बिगड़ा। तब प्रह्लाद के हाथ-पांव को जंजीरो से बांधकर समुद्र में फेकवा दिया। हरि-कृपा से वहां से भी सुरक्षित निकल कर विष्णु-वंदना करते हुए राजमहल पहुँच गए ।
जब हिरण्यकशपु प्रह्लाद को मारने के हर उपाय से थक गया तो उसे अपनी बहन होलिका की याद आयी । एक बार होलिका ने भगवान ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की थी और उनसे एक वरदान प्राप्त किया था कि आग उसे कभी जला नहीं पाएगी। इसी के साथ ब्रह्मा ने कहा था कि यह वरदान तभी प्रभावी होगा जब वह इसे स्वयं की रक्षा करने या दूसरों की भलाई करने के उद्देश्य से प्रयोग में लाएगी। हिरण्यकशिपु ने जब अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद के बारे में पूरी बात बताकर कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर जलती चिता पर बैठ जाए। वरदान के कारण होलिका का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, परन्तु प्रह्लाद जल कर मर जायेगा। वह अहंकार के कारण यह भूल गयी कि ब्रह्मा ने वरदान में दूसरों की भलाई के बारे में कहा था न कि किसी का अहित करने के लिए । सूखी लकड़ियों को बहुत बड़ी चिता बनायी गयी और सीढ़ी के सहारे होलिका प्रह्लाद को लेकर उसपर बैठ गयी। उसके बाद हिरण्यकशिपु और समस्त प्रजा के सामने उस लकड़ी के ढेर में आग लगाई गयी। होलिका अपने अहंकार में चुपचाप बैठी थी और बालक प्रह्लाद अपने प्रभु विष्णु का जाप कर रहा था। थोड़ी देर के बाद सबने देखा कि प्रह्लाद तो आराम से बैठा प्रभु का नाम जप रहा था, परन्तु, होलिका के शरीर से लपटे उठ रही थी और वह बचाओ-बचाओ चिल्लाने लगी। अग्नि की लपट इतनी तेज थी कि जब तक सैनिकों द्वारा आग को बुझाया गया तबतक होलिका जलकर मर चुकी थी और प्रह्लाद बिलकुल स्वस्थ था। अपनी बहन होलिका के मरने और प्रह्लाद के बच जाने से दानवराज हिरण्यकशिपु आपे से बाहर हो गया । प्रह्लाद जब विष्णु-जाप करता हुआ राजमहल में जाने लगा तो उसे महल के दालान में ही रोककर हिरण्यकशिपु ने उसका वध करने के लिए तलवार उठा लिया और कहा कि कहाँ है, तेरा विष्णु। उसे अभी बुलाओ। यह सुनकर प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा कि पिता जी मेरे प्रभु विष्णु तो हर जगह है-
” हममें तुममें खड़ग खम्भ में, सबमें हैं भगवान ” ।
अब तो हिरण्यकशिपु आपे से बाहर होकर बोला कि क्या तेरा विष्णु इस खम्भे में भी है, अगर है तो अभी बुलाओ, क्योंकि अब मैं तेरा वध करने जा रहा हूँ। जैसे ही हिरण्यकशिपु ने तलवार उठाया कि उसी समय काफी तेज आवाज के साथ वह खम्भा फट गया और अत्यंत ही भयानक शक्ल के भगवान विष्णु नरसिंह अवतार के रूप में प्रकट हुए। इनका शरीर अतिविकराल मनुष्य का तथा सिर सिंह का था । उस भयानक दृश्य को देखकर सारे दैत्य सैनिक इधर-उधर भागने लगे। नरसिंह अवतार प्रभु ने दहाड़ते हुए हिरण्यकशिपु को उठाकर अपने जंघा पर रखकर दोनों हाथों के नाखूनों से पेट फाड़ कर मार डाला । वह स्थान महल का दालान था अर्थात न तो घर था और न ही बाहर, समय गोधुली बेला की थी अर्थात न तो दिन था और न ही रात, हिरण्यकशिपु को भगवान ने अपने जंघा पर रखकर नाखूनों से पेट फाड़कर मारा अर्थात न तो जमीन पर और न ही आकाश में और किसी अस्त्र-शस्त्र से ही मारा, भगवान का पूरा शरीर तो नर का परन्तु सिर सिंह का था।
आज भी भारत और नेपाल में लोग बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन का त्यौहार मनाते हैं और इसके दूसरे दिन होली खेलते हैं ।
इस अवसर पर अलाव जलाया जाता है, जो नकारात्मकता को जलाने और सकारात्मकता को अपनाने का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाती है कि अहंकार, क्रूरता को अंततः हार का सामना करना पड़ेगा, जबकि सत्य और भक्ति की ही हमेशा जीत होती है।
इस दिन अपने पुराने तनावों, लड़ाई-झगड़े और नकारात्मक विचारों को जलाकर नए उत्साह के साथ जीवन जीने का संकल्प लेना चाहिए। हिंदी पंचांग के अनुसार फागुन या फाल्गुन माह वर्ष का अंतिम महीना होता है । इसी समय अर्थात पतझर के बाद वृक्षों पर नए पत्ते आ जाते हैं । मौसम सुहाना हो जाता है । फाल्गुन मास को आनंद और उल्लास का महीना भी कहा जाता है। ब्रज की होली तो सबसे न्यारी होती है। फाल्गुन मास को आनंद और उल्लास का महीना भी कहा जाता है। इसी माह को राधा-कृष्ण की लीलाओं को भी याद कर रंगों का त्योहार लोग मनाते हैं।
……….दयाल प्रसाद खरे
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