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Home/वेद, दर्शन एवं मंत्र/ॐ क्या है ?
वेद, दर्शन एवं मंत्र

ॐ क्या है ?

Dayal Prasad Khare
Dayal Prasad Khare
July 30, 2026
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ॐ

ओम (ॐ) का अर्थ हिंदी में “ओ३म्” या “ओंकार” है। हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों के अनुसार यह एक पवित्र ध्वनि और प्रतीक है । यह शब्द तीन अक्षरों के मेल से बना है – “अ”, “उ”, और “म” । विद्वानों ने अ का अर्थ उत्त्पत्ति (Creation), उ का अर्थ पालन (Nourishment) और म का अर्थ विनाश (Destruction) बताया है । यहाँ विनाश शब्द से कई लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि भगवान तो दयालु हैं तो वे विनाश क्यों करेंगे ? ऋषियों के अनुसार विनाश का तात्पर्य मनुष्य के अहंकार का विनाश, माया-भ्रम का विनाश, न कि सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश। जब मनुष्य के अहंकार का विनाश हो जायेगा तो वह मौन हो जायेगा/ ब्रह्मलीन हो जायेगा । ये तीन अवस्थाएँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है । वेदों में ॐ को “प्रणव” अर्थात ब्रह्म अर्थात परमेश्वर कहा गया है।

माण्डूक्य उपनिषद में तो “ॐ” को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है । श्रीमद्भगवतगीता के अध्याय ८ श्लोक १३ में भी स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मनुष्य एकाक्षर ब्रह्म “ॐ” का उच्चारण करते हुए मेरा अर्थात परमेश्वर का स्मरण करते हुए अपने भौतिक शरीर को त्याग देते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं । अगर सूक्ष्मता से इस श्लोक को समझें तो इसका अर्थ यह होता है कि जो भी मनुष्य ॐ का उच्चारण करते हुए अपने भौतिक शरीर को भूल कर अपने मन अर्थात अपनी आत्मा को परमपिता परमेश्वर अर्थात ब्रह्म में विलीन कर लेता है, उसे परम गति प्राप्त होती है । चारो वेदों में ॐ शब्द के महिमा का गुणगान किया गया है ।

हिन्दू धर्म में लगभग हर मन्त्र के प्रारम्भ में ॐ शब्द का उच्चारण अनिवार्य माना गया है । संभवतः इसका कारण यह है कि ॐ को ही सार्वभौमिक अर्थात यूनिवर्सल ध्वनि माना गया है । ॐ शब्द का सही ढंग से उच्चारण करने से ऊर्जा का एक संचार होता है जो मन्त्र के प्रभाव को बढ़ा देता है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि विशेष प्रकार से उच्चारित ॐ की ध्वनि एक विशेष आवृत्ति (frequency) पर होता है जो शरीर के चक्रों को सक्रिय करने में मदद करता है और विशेष शांति और एकाग्रता का अनुभव होता है।”ओम” का उच्चारण एक विशेष तरीके से किया जाता है, जो ध्यान और आध्यात्मिकता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है ।आपने कई लोगों को वर्षों से नियमित रूप से ॐ का उच्चारण करते देखा होगा । परन्तु, उनमें कोई विशेष अंतर नहीं दिखा । तो , इसका उत्तर यह है कि लाभ तभी होगा जब आप इसका वास्तविक अर्थ जान कर एक विशेष तरीके से अ, उ और म की यात्रा करते हुए मौन की मंजिल पर पहुँच कर ब्रह्मलीन हो जाते हैं।

हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मों ने भी इस आध्यात्मिक शब्द/ध्वनि की महत्ता को स्वीकार किया है । जैसे बौद्ध धर्म में ॐ का उच्चारण ‘ॐ मणि पद्मे हुं’ मंत्र में होता है। यह मंत्र तिब्बती बौद्ध धर्म में सबसे प्रसिद्ध मंत्रों में से एक है और इसका उपयोग सभी संतों और प्राणियों के लिए बुद्ध की ज्ञान और करुणा को प्राप्त करने की क्षमता को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।

जैन धर्म में ‘ॐ’ को पंच-परमेष्ठी (पाँच सर्वोच्च शक्तियाँ) का प्रतीक माना जाता है। जैन धर्म की परंपरा के अनुसार ‘ॐ’ या ओंकार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हमारे तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि ओंकारमयी होती है। इसलिए ‘ॐ’ को संपूर्ण वांग्मय(साहित्य) का आधार माना गया है।

सिख धर्म में ॐ को ‘ੴ’ (एकओंकार) अर्थात एक ही परमात्मा है,के रूप में जाना जाता है।

योग और ध्यान साधना में ॐ का सही ढंग से उच्चारण मनुष्य के अंदर एक गहन शांति और एकाग्रता का अनुभव देता है ।

…………………………….दयाल प्रसाद खरे

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